आज प्रधानमंत्री गिलानी की किस्मत तय होने वाली है। पाकिस्तान में फौज से लेकर विपक्षियों की नजर आज सुप्रीम कोर्ट की तरफ लगी है। क्या गिलानी राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी के खिलाफ भ्रष्टचार के पुराने मामले चलाने की इजाजत देंगे या फिर सुप्रीम कोर्ट में तय होंगे उनके खिलाफ अवमानना के आरोप? क्या इस मुद्दे पर गिलानी की कुर्सी जाएगी? ऐसे ही कई सवाल हैं जिसके लिए पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट पर आज हर किसी की नजर टिकी होगी।
शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस इफ्तिकार चौधरी की बेंच ने समन रद्द करने की गिलानी की अपील खारिज कर दी थी। गिलानी मुल्क की सियासत में चुने हुए पहले प्रधानमंत्री हैं जिनके खिलाफ कोर्ट की अवमानना के आरोप तय होने जा रहे हैं। आरोप साबित होने पर गिलानी को 6 महीने की जेल भी हो सकती है। उस सूरत-ए-हाल में उन्हें अपना पद छो़ड़ना पड़ सकता है। साथ ही किसी भी सरकारी पद के लिए उन पर पांच साल तक रोक लग सकती है।
दरअसल पूरे मामले की जड़ में है विवादित एनआरओ। मुशर्रफ के राष्ट्रपति रहते भ्रष्टाचार के मामलों में घिरे जरदारी समेत 8 हजार से ज्यादा नेताओं और अधिकारियों को 2007 में एनआरओ यानी राष्ट्रीय सुलह अध्यादेश के जरिए आम माफी दे दी गई थी। लेकिन 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने एनआरओ को खारिज करते हुए जरदारी के खिलाफ दोबारा जांच करने का आदेश दिया था।।
1999 में पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ ऐसे ही मामले में अदालत में पेश हुए थे, लेकिन उनके खिलाफ आरोप नहीं तय किए गए थे। लेकिन मौजूदा दौर में ऑपरेशन किल ओसामा और मेमोगेट प्रकरण के बाद से जहां सेना और सरकार के रिश्तों में गहरी दरारे आई हैं। वहीं सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच टकराव भी बढ़ता जा रहा है।
गिलानी अगर स्विस अधिकारियों को ज़रदारी के खिलाफ मामलों की जांच के लिए चिट्ठी लिख दें, तो अवमानना का मामला वहीं खत्म हो जाएगा। गिलानी सबसे ज्यादा समय तक प्रधानमंत्री पद पर बने रहने वाले पहले चुने गए सियासतदान हैं


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